Thursday, May 6, 2010

अदा भी है, सजा भी

मेरा यूँ ही कह जाना बहुत कुछ
और वो तेरा चुप रह जाना
मेरे सवालों का वो न थमने वाला सिलसिला
और तेरा जवाब में यूँ मुस्कुरा जाना
मेरा ख्यालों में सोचना तुझे
और तेरा ख्वाबों में आ जाना
मेरी ढेरों शिकायतें तुझसे
और तेरा मेरे हर शिकवे को
नाजो से उठाना
ये तेरी हर अदा
अदा भी है
और सजा भी

Monday, April 19, 2010

वो हुनर

वो हुनर नही मालूम मुझे
की जिससे
तुझे रोक लू
या की
तेरी यादों की घटरी को भी
तेरे साथ ही कर दूँ रुखसत
अपनी अमानत की पोटली से निकाल कर
मैंने तो धड़कने अत कर दी  तुझे
मगर वो अदा नही मुझमे
की तेरे दिल को बांध कर रख सकू
अपनी रवानगी तक
मेरी चाहत हमेशा जुडी रही तेरे साथ से
और तेरी चाहत अक्सर मुडती रही किसी
अंजन मोड़ की तरफ
तू सागर था
मैं थी दरिया
तेरे करीब आते आते यूँ फांसला बढा
कि सागर में दरिया मिल न सका
और दरिया;;;;;;;;;;;;;;;;दरिया भी न रहा

Monday, April 5, 2010

जाने क्यों




जाने क्यों तेरी आँखों में अपने लिए नजर तलाशती हूँ


जाने क्यों मैं किराये के मकान में घर तलाशती हूँ


पत्थर तो होते है आखिर पत्थर होई


फिर क्यों कर मैं उनमे रहबर का असर तलाशती हूँ


हाथ की लकीरे क़दमों के यूँ खिलाफ हो गई है


सजा ए जिंदगी मुकरर कर


बाकी सजाये मुआफ हो गई है


तेरी चाहतों का भी हिज्र है


और मेरी मंजिले भी हिजाब में


तक़दीर की बेवफाई का आलम यूँ है की


बाहर मौसम बहारों का है


और मेरे सारे फूल पड़े है


किसी किताब में


Monday, March 22, 2010

तेरे प्यार का अहसास




जब भी मेरे मन की तन्हाई में


तेरे प्यार की महफ़िल सजती है


जिंदगी नए सिरे से सवरती है


ओस की बूंदों सी


सीली रहती मेरी आँखों पर


जब तेरे चेहरे की चमक पड़ती है


कुछ इस तरह बदलता है मौसम


कि कोहरा छंट जाता है तब


और धुप सी खिलने लगती है


मेरे ख्वाबों की बंजर जमीं पर


जब तेरे जज्बातों की खाद पड़ती है


फिर बिन सावन के आती है


मिटटी से सौंधी खुशबू


और पतझड़ में भी


हरी भरी फसल खिलने लगती है


मेरी ख्वहि९शोन को


जब छूता है तेरा अहसास


रूह तलक भीग जाती हूँ मैं


तेरे प्यार की बारिश में


जैसे सूनी पड़ी किसी बगिया को


माली ने महका दिया हो


पंछी जिन पेड़ो का रास्ता भूल गए थे


उन पेड़ो को जैसे आज किसी ने चेह्का दिया हो


ये फ़साने नही है मेरी मोहब्बत के महज


ये मेरी आँखों में महफूज


अमानत है उन अश्को की


जो कभी तुझसे बिछड़कर बहे


कभी तेरे न मिलने से छलके


तेरे रस्ते और मंजिलों का


इल्म नही है मुझे


इन्तहा है तो इस बात की


कि आज भी मेरे दिल की


हर गली जाती है


तेरे प्यार के घर से गुजर के


Sunday, January 3, 2010

प्रेम का अक्स

यूँ ही नही हूँ मैं तन्हाईओं से खफा

और महफ़िल से रुसवा

ये वजह है..

तेरा एहसास

जो

मेरी रूह से रुखसत होता नही

और उस पर

तेरे प्रेम का अक्स

जो आकर कहता है मुझसे

कि ..

बिता हुआ लम्हा हूँ मैं

Wednesday, November 4, 2009

प्रेम के अहसास

मिल कर कभी
कभी बिना मिले ही
बिछड़ जाते है कुछ लोग
ठहर कर कभी
कभी बिना रुके ही
बीत जाते है कुछ पल
मगर अहसास नही मरते
मुलाकातों के साथ पैदा होते है
जज्बातों से जुड़ते है
और यादो के साथ जवान हो जाते है
प्रेम अक्सर अधुरा रह जाता है
अहसास हमेशा अमर हो जाते है

Friday, July 3, 2009

प्रेम में जिंदगी यूँ भी रही

किसी को मेरी

और .............

मुझे !!!!!!!!!!!!!!!

किसी और की तलाश रही

तनहा नही थी मैं .................

महफिल थी आस पास .............

मगर जिंदगी उदास रही !!!!!!!!!!!!

कुछ बूंदों की आस थी !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

सुखी धरती की तरह ......

मगर जब बरसे बदरा !!!!!!!!!!!!!!!!!

तो अमृत की प्यास रही .......................

यूँ तो आँखों को पढ़ लेना ही .........

काफी था उस एहसास के लिए ........

लेकिन जब नजरे ही न मिल सकी .............

तो शब्दों की दरकार रही ................

दर भी उसी का था ................दस्तक भी उसी ने दी

मगर जब मैंने खोल दिए!!!!!!!!!!!!दरवाजे सारे

तो हमें पुकारती ..........................

ऐसी कोई आवाज़ न रही ........................................

जिंदगी में प्रेम था मगर

प्रेम में जिंदगी यूँ भी रही ..............!!!!!!!!!..............